देखिये साहब

किसी को दिल में उतारकर, देखिए साहब,
अपने अहम को मारकर, देखिए साहब।

संवर जाती है सारी जिंदगी अपनी पल में,
कभी ‘उसे’ अपना बनाकर, देखिए साहब ।

दुखों के पर्वतों ने हार मानी है एक दिन,
हृदय से प्रभु को गुनगुनाकर, देखिए साहब ।

राम आएंगे बेर खाने स्वयं ही चलकर,
खुद को शबरी में ढालकर, देखिए साहब।

सुरेश मिश्र

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